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ब्रह्मपुर का पौरव वंश और स्थानीय शासन

ब्रह्मपुर का पौरव वंश और स्थानीय शासन        ब्रह्मपुर नगर उद्घोष के साथ पर्वताकार राज्य में वर्म्मन (वर्म्मा) नामान्त वाले पांच पौरव शासकों ने राज्य किया, जिनका शासन काल छठी शताब्दी ई. के आस पास मान्य है। ये शासक राजा हर्ष के पूर्ववर्ती थे। वीरणेश्वर भगवान के आर्शीवाद से सोम-दिवाकर वंश (पौरव वंश) में क्रमशः विष्णुवर्म्मा, वृषणवर्म्मा, अग्निवर्म्मा, द्युतिवर्म्मा और विष्णुवर्म्मा द्वितीय शासक हए। इस वंश के अंतिम दो शासकों द्युतिवर्म्मा और विष्णुवर्म्मा ने अपने नाम से ताम्रपत्र उत्कीर्ण करवाये थे, जो अल्मोड़ा के स्याल्दे तहसील के तालेश्वर गांव से सन् 1915 ई. में प्राप्त हुए। इन ताम्रपत्रों के आधार पर कह सकते हैं कि गौ-ब्राह्मण हितैषी इस वंश के अंतिम दो शासक- द्यतिवर्म्मा और विष्णुवर्म्मा स्वतंत्र शासक थे, जिन्होंने परम भट्टारक महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।       ब्रह्मपुर से संचालित पर्वताकार राज्य, सत्ता-विकेन्द्रीकरण का उदाहरण प्रस्तुत करता है। विषय के अधिकारी ’दण्ड-उपरिक’ का मंत्रीमण्डल वरीयता क्रम में प्रथम स्थान था, जिसे दण्ड देने का भी अधि...

ब्रह्मपुर का भूगोल

ब्रह्मपुर का भूगोल भारत का प्राचीन इतिहास बीसवीं शताब्दी से पहले जब लिखा गया तो, आर्य जाति के उदय और उत्थान तक सीमित था। आर्यों के मूल निवास को लेकर व्यापक परिचर्चा और शोध उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय इतिहास का मुख्य विषय रहा था। आर्यों द्वारा रचित वैदिक ग्रंथों के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास की घटनाओं को संयोजित किया गया था। लेकिन बीसवीं शताब्दी में भारतीय रेलवे के विस्तार हेतु किये गये निर्माण और खुदाई कार्यों से एक अति प्राचीन सभ्यता का समावेश भारतीय इतिहास में अप्रत्याक्षित रूप में हुआ। योजना बद्ध और व्यापक अन्वेषणों द्वारा पुरातात्विक इतिहास को प्रकाश में लाने का कार्य सन् 1921 में शुरू हुआ। बीसवीं शताब्दी में सिंधु एंव उसकी सहायक नदियों के जलागम क्षेत्र में व्यापक अन्वेषणों से ‘सैंधव’ या ‘हड़प्पा’ सभ्यता अचानक सामने आयी और इतिहासकारों के लिए पूर्व में लिखित भारतीय इतिहास को पुनः क्रमबद्ध करना आवश्यक हो गया। इसी प्रकार बीसवीं शताब्दी में उत्तराखण्ड के इतिहास में भी नवीन तथ्यों के प्रकाश में आने से पूर्व लिखित इतिहास को पुनः क्रमबद्ध करना आवश्यक हो गया था।  ...

ब्रह्मपुर के पौरव राज्य में भूमि पैमाइश-

ब्रह्मपुर के पौरव राज्य में भूमि पैमाइश-      ब्रह्मपुर की पहचान पुरातत्व विभाग के प्रथम महानिदेशक अलेक्जैंडर कनिंघम ने पश्चिमी रामगंगा घाटी में स्थित चौखुटिया के निकटवर्ती क्षेत्र से की, जिसे उन्होंने लखनपुर-वैराटपट्टन कहा। लखनपुर-वैराटपट्टन रामगंगा घाटी के पृथक-पृथक पुरास्थल हैं, जहाँ अब कमशः लख्नेश्वरी और वैराठेश्वर मंदिर स्थापित है। इन दो स्थलों के मध्य लगभग 5 से 6 किलोमीटर की दूरी है। वैराठेश्वर मंदिर रामगंगा के बायें तट पर चौखुटिया में है। जबकि लख्नेश्वरी मंदिर चौखुटिया के दक्षिण में लगभग 6 किलोमीटर दूर चौखुटिया-रामनगर सड़क के दायें तथा रामगंगा के बायें तटवर्ती गांव में है। चौखुटिया क्षेत्र के 5 से 6 किलोमीटर के घेरे में ही पौरव वंश का ब्रह्मपुर नामक प्रसिद्ध नगर था, जिसे पुरों में सर्वश्रेष्ठ कहा गया।      ब्रह्मपुर नगर और पर्वताकार राज्य में छठी शताब्दी के आस पास पांच पौरव शासकों ने राज्य किया। चौखुटिया के निकटवर्ती तालेश्वर ग्राम से प्राप्त दो ताम्रपत्रों से ही ब्रह्मपुर का पौरव वंश उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में अपना स्थान बना पाया। ब्रह्मपुर के ...