संदेश

अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र

चित्र
 अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र  अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र कुमाऊँ के पृथक-पृथक स्थानों से प्राप्त हुए है, जो कुमाऊँ के सरयू पूर्व भू-भाग पर रजवारों द्वारा शासित क्षेत्र के राजनैतिक भूगोल को निर्धारित करने में सहायक हैं। तेरहवीं शताब्दी के अंतिम पड़ाव में कुमाऊँ का सरयू पूर्व क्षेत्र सीरा, सोर और गंगोली राज्य में विभाजित हो चुका था। सीरा राज्य में कत्यूरियों की एक शाखा अस्कोट-पाल वंश का शासन सन् 1279 में अभयपाल के नेतृत्व में आरंभ हुआ था। प्रकाशित अस्कोट-पाल वंशावली के अनुक्रम में अभयपाल के पश्चात क्रमशः निर्भयपाल, भारतीपाल, भैरवपाल और भूपाल राजा हुए थे। भूपाल के पश्चात पाल वंशावली में 26 राजाओं के नाम ज्ञात नहीं हैं। चौदहवीं शताब्दी में अस्कोट-पाल वंश ने संभवतः कत्यूरियों की एक अन्य शाखा डोटी-मल्ल की अधीनस्थ स्वीकार कर ली थी। मल्ल राजाओं ने अस्कोट के उत्तर-पश्चिम में स्थित सीराकोट में डोटी राज्य की पश्चिमी राजधानी स्थापित की, जिसका पतन सन् 1581 ई. में हुआ था।  डोटी राज्य का संस्थापक नागमल्ल था, जो अस्कोट-पाल वंश के संस्थापक अभयपाल के भ्राता निरंजनदेव के ...

गंगोली में सामन्ती शासन

चित्र
 गंगोली में सामन्ती शासन  गंगोली में सामन्ती शासन व्यवस्था सोलहवीं शताब्दी में चंद कालीन कुमाऊँ राज्य की प्रमुख विशेषता थी। इस सामन्ती शासन काल को रजवार शासन काल भी कह सकते हैं। गंगोली में सामन्ती शासन, चंद राजा रुद्रचंद द्वारा सीराकोट को विजित करने के उपरांत शुरू हुआ था। सीराकोट पूर्वी रामगंगा और काली अंतस्थ क्षेत्र का सबसे दुर्भेद्य दुर्ग था, जिस पर डोटी (नेपाल) के मल्ल शासक हरिमल्ल का अधिकार था। डोटी के मल्ल शासक भी प्राचीन कत्यूरी शाखा से ही थे। सीराकोट विजय के साथ ही सीरा राज्य सहित सम्पूर्ण कुमाऊँ पर रुद्रचंद का अधिकार हो गया था। नव विजित सीरा राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के संबंध में पंडित बद्रीदत्त पाण्डे लिखते हैं- ‘‘इसके बाद राजा रुद्रचंद अल्मोड़ा को लौट आये और पुरुष पंत को हुक्म दिया कि विजित प्रदेश का इन्तजाम पूरा व पक्का करके अल्मोड़ा आयें।’’ पुरुष पंत या पुर्खूपंत गंगोली के ब्राह्मण थे, जो अंतिम मणकोटी शासक नारायणचंद के दीवान थे। गंगोली के इस योग्य ब्राह्मण की रणनीति और कूटनीति द्वारा ही रुद्रचंद सीराकोट जैसे दुर्भेद्य दुर्ग को विजित करने में सफल हुए थे। सीराकोट क...

रजवार शासक आनन्दचंद रजवार का किरौली ताम्रपत्र

चित्र
 रजवार शासक आनन्दचंद रजवार का किरौली ताम्रपत्र  बड़ाऊँ या वर्तमान बेरीनाग तहसील के किरौली गांव से अस्कोट राजपरिवार के रजवार शासक आनन्दचंद रजवार का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ, जिसे किरौली ताम्रपत्र कहा जाता है। रजवार शासक का किरौली ताम्रपत्र सर्वप्रथम सन् 1999 ई. में प्रकाश में आया था। यह ताम्रपत्र राजाधिराज आनन्द रजवार ने पूजा-पाठ हेतु केशव पंत को सन् 1597 ई. में भूमिदान हेतु प्रदान किया था। किरौली गांव बेरीनाग से 13 किलोमीटर दूर उडियारी-थल मार्ग (राज्य मार्ग-11) पर स्थित है, जिसके दक्षिण में काण्डे गांव है। राज्य मार्ग-11 इन दोनों गांवों की सीमा को निर्धारित करता है। पिथौरागढ़ जनपद में किरौली नाम वाले अन्य गांव भी हैं। इसलिए बड़ाऊँ के किरौली गांव को काण्डे-किरौली कहा जाता है। इस गांव के उत्तर में स्थित पर्वत श्रेणी को हिमालयन गजेटियर के लेखक एडविन थॉमस एटकिंसन ने ‘खमलेख’ कहा, जिसके एक शिखर पर पिंगलीनाग देवता का मंदिर स्थापित है। इस नाग देवता की पूजा-पाठ हेतु केशव पंत को किरौली गांव प्राप्त हुआ, जो 29° 49‘ 38‘‘ उत्तरी अक्षांश तथा 80° 03‘ 01‘‘ पूर्वी देशांतर रेखा पर स्थित है। रजवार...

किरौली ताम्रपत्र

चित्र
 किरौली ताम्रपत्र  किरौली ताम्रपत्र का संबंध गंगोली राज्य के रजवार शासकों से था। उत्तराखण्ड का प्राचीन कत्यूरी राज्य तेरहवीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित हो गया था। इनमें से एक राज्य सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में स्थित था, जिसे ‘गंगावली’ या ‘गंगोली’ कहा गया। प्राचीन गंगोली राज्य नाग मंदिरों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र विशेष में कालीनाग, पिंगलीनाग, बेड़ीनाग, धौलीनाग, फेणीनाग, हरीनाग और वासुकिनाग के प्रसिद्ध नाग मंदिर हैं। गंगोली के गणाई-गंगोली, बेरीनाग और कपकोट तहसील में वासुकिनाग का एक-एक मंदिर है। बेरीनाग तहसील में स्थित लोहाथल वासुकि नाग मंदिर के अतिरिक्त सभी नाग मंदिर गंगोली के ऊँचे पर्वतों पर तथा शेषनाग प्राकृतिक रुप में पाताल भुवनेश्वर गुहा में स्थापित हैं। बेड़ीनाग का मंदिर जिस पर्वत पर है, उसके उत्तरी पनढाल पर बेरीनाग नगर का विकास ब्रिटिश काल में आरंभ हुआ था। इससे पूर्व, बेरीनाग के आस पास का क्षेत्र बड़ाऊँ नाम से जाना जाता था। संभवतः बेड़ीनाग से बड़ाऊँ शब्द की व्युत्पत्ति हुई, जहाँ अंतिम अक्षर ‘ऊँ’ शिवत्व का प्रतीक ऊँ पर्वत को अभिव्यक्त करता है। बड़...

गंगोली के रजवार शासक

   गंगोली के रजवार शासक             तेरहवीं शताब्दी में कत्यूरी राज्य के पतनोपरांत मध्य हिमालय (कुमाऊँ क्षेत्र) स्वतंत्र लघु राज्य इकाइयों में विभाजित हो गया था। उन्हीं में एक गंगोली भी था। कुमाऊँ की दो प्रमुख नदियों सरयू और पूर्वी रामगंगा से घिरे भू-भाग को गंगोली कहा जाता था, जहाँ सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में ‘रजवार’ नामान्त उपाधि धारक शासकों ने राज्य किया था, जो गंगोली के रजवार शासक कहलाये। वास्तव में गंगोली राज्य का राजनीतिक इतिहास तेरहवीं शताब्दी में रामचन्द्रदेव के नेतृत्व में अस्तित्व में आया था, जिन्हें उत्तर कत्यूरी कहा जाता है। इस वंश के चार नरेशों ने गंगोली पर लगभग 100 वर्ष शासन किया था। इनके पश्चात गंगोली में नेपाल मूल के चंद वंशीय शासकों का शासन आरंभ हुआ, जिन्हें मणकोटी भी कहा जाता है। इस राजवंश ने गंगोली पर लगभग 200 वर्ष शासन किया था। अिंंतम मणकोटी राजा नारायणचंद को पराजित कर चंद राजा बालो कल्याणचंद ने गंगोली पर अधिकार करने में सफल हुए थे। इस चंद राजा ने गंगोली के शासन हेतु ‘गंगोला’ नामक एक नवीन राज्य पद को पदावस्थापित किय...

कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष

 कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष  मध्य कालीन भारतीय इतिहास में कन्नौज का त्रिकोणीय संघर्ष अपना विशेष महत्व रखता है। इसी प्रकार मध्य हिमालय के पर्वतीय राज्य कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष भी उत्तराखण्ड के स्थानीय इतिहास में अपना महत्व रखता है। कन्नौज के त्रिकोणीय संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट सम्मिलित थे, वहीं कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष डोटी के मल्ल, चम्पावत के चंद और पश्चिमी कत्यूरी राजाओं के मध्य हुआ था। कन्नौज का त्रिकोणीय संघर्ष जहाँ आठवीं से दशवीं शताब्दी के मध्य हुआ था, वहीं कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष चौदहवीं से सोहलवीं शताब्दी के मध्य हुआ था। कन्नौज के संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार, तो कुमाऊँ के संघर्ष में चंद वंश सफल हुआ था।  कुमाऊँ के त्रिकोणीय संघर्ष की पृष्ठभूमि-              कुमाऊँ के त्रिकोणीय संघर्ष के मूल में तेरहवीं शताब्दी में कत्यूरी राज्य का विभाजन था। इस विभाजन के फलस्वरूप कुमाऊँ क्षेत्र द्वराहाट, कत्यूर, गंगोली, अस्कोट और चंपावत आदि स्थानीय राज्य इकाइयों में विभाजित हो गया। कत्यूरियों की एक शाखा नेपाल के डो...

राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र

 राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र कुमाऊँ में विस्तृत चंद राज्य के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं। इस राजा के शासन काल में चंद राज्य की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानान्तरित हुई। अन्य चंद राजाओं की भाँति राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी स्थानीय कुमाउनी भाषा में उत्कीर्ण हैं। जबकि उत्तराखण्ड के पौरव और कार्तिकेयपुर राजवंश के शासकों ने अपने ताम्रपत्र संस्कृत भाषा में निर्गत किये थे। जहाँ कार्तिकेयपुर और पौरव ताम्रपत्रों में राज्य संवत् तिथि का उल्लेख किया गया, वहीं चंद शासकों के निर्गत ताम्रपत्रों में विक्रम और शक संवत् का प्रयोग किया गया है। यही कारण है कि चंद शासकों के शासन काल को निर्धारित करने में उनके द्वारा निर्गत ताम्रपत्र सहायक सिद्ध हुए हैं। राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी उसके शासन काल को सन् 1545 से 1568 ई. मध्य निर्धारित करते हैं। जबकि कुमाऊँ इतिहास पर कार्य करने वाले विद्वानों और इतिहासकारों ने इस चंद राजा के शासन काल को सन् 1555 से 1568 के मध्य निर्धारित किया था। पिथौरागढ़ के भेटा से प्राप्त ताम्रपत्र में क्रमशः शाके 1467 और 1602 विक्रम संव...

बालो कल्याणचंददेव का गंगोली पर अधिकार

 बालो कल्याणचंददेव का गंगोली पर अधिकार बालो कल्याणचंददेव का गंगोली पर अधिकार चंद राज्य के लिए महान उपलब्धि थी। इस राज्य पर अधिकार के साथ चंद शासकों के लिए सम्पूर्ण कुमाऊँ पर अधिकार करने का मार्ग प्रशस्त हो गया। कुमाऊँ में चंद राज्य का विस्तार धीरे-धीरे सैकड़ों वर्षों की राजपथ यात्रा में हुआ। चंद राज्य की आरंभिक राजधानी चम्पावत में थी, जिसके ठीक उत्तर में स्थित गंगोली राज्य पर अधिकार का प्रयास बालो कल्याणचंददेव के पूर्ववर्ती चंद राजाओं ने अवश्य किया होगा। लेकिन बालो कल्याणचंददेव (1545-1568) ही गंगोली पर अधिकार करने में सफल हुए। आरंभिक चंद राज्य के सीमावर्ती दो प्राचीन राज्यों गंगोली और सोर (वर्तमान पिथौरागढ़ नगर) के मध्य में सरयू सीमावर्ती नदी थी। इस नदी की सहायक नदी पूर्वी रामगंगा गंगोली और सोर राज्य की सीमावर्ती नदी थी। भौगोलिक दृष्टि से सरयू और पूर्वी रामगंगा का अंतस्थ भू-भाग ही प्राचीन गंगोली राज्य था। इस प्राचीन राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग पर ही सरयू और पूर्वी रामगंगा नदी का पवित्र प्रयाग है, जिसे रामेश्वर तीर्थ कहा जाता है।  समकालीन राजनीतिक भूगोल-      ...

गंगोला राज्य पद

गंगोला राज्य पद           गंगोला राज्य पद कुमाऊँ में चंद वंश के शासन काल में अस्तित्व में आया था। चंद राज्य पदों की एक विशेषता थी कि कालान्तर में एक राज्य पद जातिगत व्यवस्था में परिवर्तित हो एक जाति बन जाती थी। जैसे विशिष्ट राज्य पद से कुमाऊँ में बिष्ट जाति अस्तित्व में आयी। कुमाऊँ की बिष्ट जाति में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों वर्ण सम्मिलित हैं। बिष्ट की भाँति गंगोला राज्य पद भी कालान्तर में एक जाति में परिवर्तित हो गयी। वर्तमान में गंगोला कुमाऊँ में क्षत्रियों की एक जाति भी है, जो नैनीताल जनपद के ओखलकाण्डा के कुलौरी ग्राम सभा में निवास करते हैं। लेकिन पंडित बद्रीदत्त पाण्डे गंगोला जाति को वैश्य वर्ण की श्रेणी में रखते हैं और लिखते हैं- ‘‘ ये साह लोग पहले गंगोली में मणकोटी-राज्य काल में थे, अब भी है। अल्मोड़ा बसने पर जो अल्मोड़ा में आये, वे ‘गंगोला’ उपनाम से प्रसिद्ध हुए।           गंगोला राज्य पद की भाँति समय-समय पर चंद काल में विशिष्ट, चार बूढ़ा, चौधरी, छः गौर्या, बारह अधिकारी, छः थर और बारह अधिकारी राज्य पद अस्तित्व में आये थे। ...